गुरुकुल ५

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Thursday, 26 February 2015

यज्ञ


यज्ञ
अग्नि प्रज्ज्वलित कर
समिधा को किया समर्पित
स्वाहा को

अधर्म को नष्ट करने
धर्म के रक्षार्थ
दहन किया
द्विज रावण का

विश्व कल्याण मे
अधर्म के नाश
और धर्म स्थापना मे
होलिका दहन

17  मार्च 2014
26 फरवरी 2015

Tuesday, 29 July 2014

आज फिर जीने की तमन्ना है आज फिर मरने का इरादा है


**कहानी और कथाओं का दौर शायद आज खत्म सा हो गया हो किन्तु कुछ कथा
आज भी प्रासंगिक लगते है इन्ही में से एक कहानी बाबूजी ने बचपन में सुनाई थी
आपसे साझा करता हूँ

प्राचीन काल में एक बालक की मृत्यु एक संजोग पर टिकी थी जब उसकी माँ को
ज्ञात हुआ तो उसने ब्रह्मा से मृत्यु को टालने का निदान पूछा बिरंची जी विधी के
विधान को बदल पाने में अपनी असमर्थता जाहिर की और माँ को श्री हरि के पास
जाने को कहा माँ के अनुनय विनय पर स्वयं भी साथ गये किन्तु विष्णु जी ने भी
असमर्थता बतलाकर देवाधि देव महादेव के पास जाने को कहा शायद उनके पास
इसके मुक्ति का मार्ग मिले।

माँ ने ब्रह्मा जी, विष्णु जी, के साथ महादेव जी को अपनी व्यथा सुनाई उसने
कहा इस बुढ़ापे में वह निःसंतान नहीं होना चाहती।
शिव जी ने कहा चलो देखें आखिर वह कौन बालक है जिस पर ऐसी संकट आन पड़ी है
शंकर जी सहित विष्णु जी और ब्रह्मा जी और माँ ने जैसे ही बच्चे को देखा बालक
मृत्यु को प्राप्त हो गया।

वास्तव में इन्ही पाँचों के मिलन का यही पल
उस बालक की मृत्यु का पल था ये माँ नहीं जानती थी।

**रामायण, रामचरित मानस, महाभारत की कथा और इनके कालजयी पात्रों से सदैव
प्रेरणा प्राप्त किया और मेरे ज़िन्दगी के भी करीब हैं, चाहे वो भीष्म हो या कर्ण या फिर
परम मित्र दुर्योधन { सुयोधन }

 बाबूजी ने महाभारत  की कथा में बतलाया कि दुर्योधन को अद्भुत ईच्छा मृत्यु प्राप्त थी।

 { मूल कथा के साथ एक अद्भुत सहायक कथा जुड़कर कथा को रोचक और नई दिशा 
और दशा दे जाती है यह *क्षेपक कथा  * भी शायद उसी प्रसंग का एक जीवंत भाग हो }

दुर्योधन ने जीवन नहीं मृत्यु के लिए वरदान माँगा था
*एक ही पल में हर्ष और विषाद की अनुभूति का संयोग हो तब मुझे मृत्यु प्राप्त हो*
वरदान माँगा और मिला भी किन्तु विधि का विधान अटल होता है

सुयोधन का सरोवर में गुप्त वास सम्भव कहाँ बन पड़ा भीम के ललकारने पर
सरोवर से बाहर आने पर लीलाधारी कृष्ण के रचे महाभारत में दुर्योधन आहत
असहाय बलराम भी धर्म अधर्म के युद्ध में  माखन चोर के सामने

अश्वत्थामा का गुरू पुत्र प्रेम ले आया धोखे में निरपराध पाण्डव पुत्रों का शीश
शायद यही पल बन गया हर्ष और विषाद के मिलन और दुर्योधन के वर का क्षण

कहानी और कथाओं का दौर शायद आज खत्म सा हो गया हो किन्तु ऐसा लगता है
गीतकार शैलेद्र जी को इस गीत की प्रेरणा ऐसे ही किसी प्रसंग से मिली होगी .
मूल भाव वही रहे, दृश्य बदल गये, ढल गये मर्म गीत में
संगीत और नृत्य ने समां बाँध दिया


काँटों से खींच के ये आँचल
तोड़ के बंधन बांधे पायल
कोई न रोको दिल की उड़ान को
दिल वो चला ह ह हा हा हा हा

आज फिर जीने की तमन्ना है
आज फिर मरने का इरादा है

कल के अंधेरों से निकल के
देखा है आँखें मलके मलके
फूल ही फूल ज़िंदगी बहार है
तय कर लिया अ अ आ आ आ आ
आज फिर जीने...
मैं हूँ खुमार या तूफ़ां हूँ
कोई बताए मैं कहाँ हूँ
डर है सफ़र में कहीं खो न जाऊँ मैं
रस्ता नया अ अ आ आ आ आ
आज फिर जीने...

समर्पित मेरे मन की ब्लॉग की सर्जिका अर्चना चाव जी को
जून 2013

Tuesday, 25 March 2014

गुरुकुल ५

THE TREE NEVER STOPPED GIVING

पू मा शा पाटियापाली
विकास खण्ड करतला, कोरबा, छत्तीसगढ़  
                

विद्यालय के मुख्य मार्ग और द्वार पर स्वागत करता आम का वृक्ष

जीर्ण शीर्ण ग्राम पंचायत भवन जिसे तोड़कर नया स्कुल भवन बनाने की मसक्कत जारी
 है जन सहयोग से यहाँ इसी गर्मी की  छुट्टी में निर्माण कार्य पूर्ण हो जायेगा

विद्यालय के निंजी सड़क पर दोनों ओर रोपित नीम और अशोक के पौधे अतिथियों
का स्वागत करते साथ ही खुले वातावरण में बच्चों के मध्यान्ह भोजन का बैठका

नीम का पेड़ जिसकी छाया में बैठकर चाय कि चुस्की ली जाती है और कभी कभार
भजिया, पकौड़े, पोहा, सेवई का आनंद ले लेते हैं कुक होते हैं बुधराम यादव जी { भृत्य }

हर आदमी सोचता है वह महान है किन्तु उसे श्रेष्ठ बनाते हैं उसकी परिधि के लोग 
इसी तरह इन पौधों को पानी सींचा बच्चों ने रक्षा की गांव वालों ने और बाड़ को बाँधा 
बच्चों संग मिलकर बुधराम यादव जी में भर दोपहरी तपती धूप में, तब ये बच पाये 
मुझे सदा गर्व रहा अपने बच्चों के मेहनत पर विद्यालय को अनुशासित उन्होंने बनाया
स्वच्छता का पाठ हमने उनसे पढ़ा और पोथी के लेखक हम बना दिये गये, लो बोलो जी

विद्यालय मार्ग पर रोपे गये २० नीम के पौधे बच पाये ०७ पौधे, पर्याप्त है गांव के लोगों के
मुखारी के लिये, संतोष है चलो कुछ तो हुआ लोग कुछ बरस यादों को चबायेंगे तो सही

पार्श्व में दिखता बंज़र जमीन इसका ही हिस्सा है स्कुल भवन का सड़क और मैदान
बच्चों के मेहनत और लगन ने ही इसे आज इतना हरा भरा बना दिया कि बस

ये अशोक का पेड़ आज २० फीट से ज्यादा ऊँचा है इसे भी अन्य ४२ पौधों की भांति एक ही रात में 
काट दिया गया था किन्तु जे. एस.कँवर जी ने मिट्टी की पुट्टी बांधकर इसे नया जीवन दिया

एक इमारती पेड़ कसही बरपाली रेल्वे स्टेशन के समीप से लाकर रोपित किया गया
नीम की तरह गर्मी माह में बहुत घनी छाया देता है और संयुक्त पत्तियां पायी जाती हैं

सबसे ज्यादा दातुन की त्रास सहने वाला नीम का पेड़ कई बार मुख्य डाल टूटने के बाद भी
अपनी अस्मिता को बचाये लोगों को प्रेम बांटता बिना किसी प्रतिरोध हँसता रोज 

१९९८  में मेरी पदस्थापना की गई उच्च वर्ग शिक्षक किन्तु २००० में पू मा शा पाटियापाली  

तब शाला में लड़कियों के लिये बाथरूम नहीं था गांडापाली के सरपंच अमर सिंह से ४ बोरी
सीमेंट अनुदान में प्राप्त कर अपने हाथों से बनाया बाथरूम, आज भले ही जीर्ण शीर्ण, भग्न


जीर्ण शीर्ण और भग्न बाथरूम { मेरे द्वारा निर्मित }
विद्यालय भवन के पीछे लगाया नीम का पेड़ आज बिजली लगी पिछले साल तक
बिजली नहीं थी तब इन्हीं पेड़ों ने ठण्डा रखा भवन को और बच्चों का अध्ययन और
हमारा अध्यापन भी अवरुद्ध नहीं हुआ ग्राम्य जीवन और विद्यालयों की यही शान

शाला भवन के सामने लगा बेल का पेड़ मेरे कमरे को ठण्डक और सुकून देता है
सावन के महीने में लोगों को पूजा के विल्व पत्र देता, ख़ुशी होती है महिलाओं को

अशोक के पौधे के साथ स्कुल की शोभा बढ़ाते बाड़ में लगे पौधे जहां मैं अक्सर खड़ा
अपने भाग्य को सराहता अपने विगत चौदह बरस की यादों में खो जाता हूँ

स्वागत में शाला के प्रवेश द्वार पर अशोक का वृक्ष शालीनता से खड़ा विगत कई बरसों से

विद्यालय के पीछे लगाया गया गुलमोहर पतझड़ कि मार सहकर किन्तु रुकिए
फूल लगेगे और लाल कर देगा शाला की छत को आसमान से लगकर झरने जमीं पर

बांस की बाड़ हर तीसरे दिन बांधते हैं और बच्चे शाम को क्रिकेट खेलते रोज बैठकर 
उस पर झूलकर नीचे कर जाते है वो अपनी ज़िद पर अड़े हम भी अपनी ज़िद पर 

चमकती पत्तियाँ प्रेम का सन्देश देती तुम मेरी सेवा करना मैं तुम्हे घनी छांव दूंगा 


खम्हार का इमारती पेड़ पतझड़ कि कहानी बयां करता मेरी तरह अकेलेपन की 
४२ पेड़ एक ही रात काट दिये गये थे  जिनकी कहानी उनके ठूंठ ही की जबानी 


किसी की  नज़र लगी मुझे काट दिया गया 

मेरा क्या कुसुर मैं तो छाँव देता हूँ  

एक वृक्ष सौ पुत्रो के समान है?

और करे अपराध और पाये फल भोग 

जल ही जीवन है तो वनस्पति?

जंगल नहीं होता तो जंगल नहीं कटता 

इक्कीसवी सदी में भी लोग नासमझ हैं ?

बेक़सूर था मैं फिर क्यूँ मुझे सजा मिली ?

*हमारी  उम्र बीत गई आशियाँ बसाने में
इन्हे समय नहीं लगा आशियाँ जलाने में 

*आज भी मेरे लहू का रंग हरा हो जाता है
और कोपलें बयां करती हैं धुप की कहानी 


कल तक जो जमीं बंज़र थी आज बच्चों ने अपने श्रमकणों से सींचकर हरा कर दिया 

वो आम का पेड़ जिसकी छाया में हम विगत  १४ बरसों से प्रार्थना करते आ रहे हैं यही नहीं 
प्रति वर्ष इसी वृक्ष की  छाया में गणतंत्र दिवस को सोल्लास सांस्कृतिक कार्यक्रम के रंग में डूबे  
 पुरे गांववासी एक छत के तले बिन भेद भाव सहज भाव से भूल जाते है दीन दुनिया 


२६ जनवरी २०१४ को आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम को अपनी छाँव देता आम का पेड़ 
ईश्वर उस महान व्यक्ति को स्वर्ग में उच्च पद प्रदान करें जिसकी प्रेरणा से पेड़ लगे 
स्वर्ग से भी ज्यादा संसार की सबसे खूबसूरत जगह
मेरे विद्यालय का आँगन
२५ मार्च २०१४ 

Saturday, 22 March 2014

पीथमपुर मेला

पीथमपुर का मेला 
प्रतिवर्ष चैत्र माह कृष्ण पक्ष पञ्चमी { रंग पञ्चमी } को भरता है
आइये मेला का आज आँखों देखा आनंद लें

 तीन सौ पैतीस साल पुराना वट वृक्ष { लोगों के मतानुसार }


 बाबा कलेश्वर नाथ कि सवारी देखने खड़े दर्शनार्थी


 भीड़ को नियंत्रित करती और दिशा निर्देश देती सुरक्षा व्यवस्था में नागरिक और पुलिस


 पीथमपुर का मेला नागा बाबा का धाम बरसों बरस अपनी टोली संग 

 नागा बाबा अपने यात्रा में मुख्य मार्ग में


 नागा बाबा परंपरागत वेश में 


संत भी परंपरागत अस्त्रों संग यात्रा में  


 बाबा कलेश्वर नाथ की सवारी और पुलिस अभिरक्षा संतों और जन कल्याण में


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बाबा कलेश्वर नाथ कि सवारी प्रति वर्ष चैत्र कृष्ण पक्ष पञ्चमी को निकाली  है 

मेला लगे और मौत का कुआं { मोटर साइकल और कार रेस } न हो मेला लगा कहाँ?


झूला झूले नंदलाला छत्तीसगढ़ के मेले की परम्परा में शामिल 


मेले में रुद्राक्ष बेचने और खरीदने लोग आते हैं रुद्राक्ष अपनी टहनी सहित बिक्री हेतु 


साधु संत भी तकनीक और आधुनिक संचार प्रणाली से अछूते नहीं रह गये 



मुख्य द्वार पर आज भी संत कि सेवा में चिलम भरते लोग गर्व अनुभव करते हैं 


समाज ने जो दिया प्रेम से लिया और किसी ने जो भी माँगा बिन संकोच दिया
शायद यही संत या साधु हों अपनी धुन में मगन मंदिर के मुख्य द्वार पर  



मांदर और मृदंग के आकर के राम कांदा आकर्षण और स्वाद का केंद्र सदा बना रहा
वैष्णव जी, चौहान जी, मामा मदन जी, और शैलेन्द्र बाबू हम भी फोटो ग्राफर के रूप में शामिल 

पार्श्व में कलकल बहती छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी नदी हसदेव  
हसदेव नदी तट पर स्थित हरहर महादेव कलेश्वर नाथ जी का मंदिर
हसदेव नदी का विहंगम दृश्य अपनी अनकही कहानी समेटे सबका सदा इंतज़ार करती 


कलेश्वर नाथ मंदिर का सांध्य कालीन ऊपरी मनोरम दृश्य 


गोधूलि बेला में लौटती सवारी और कन्धा लगाते श्रद्धालु वही जोश वही उमंग

आदरणीय राहुल कुमार सिंह सिंहावलोकन के सर्जक द्वारा मेला के संबंध 
में वृहद लेख ब्लॉग जगत को दिया है मेरा यह अंश मात्र भी उनकी ही देन 

समर्पित बिलासपुर निवासी नेचर सिटी के संरक्षक प्राण चड्ढा भाई जी को 
२१ मार्च २०१४