गुरुकुल ५

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Tuesday, 27 March 2012

आह्वान



गाओ मंगल गान
आया स्वर्ण विहान
मंथन कर दे युग के गौरव
कर दे अमृत दान

तेरा पौरुष बोल रहा
सागर रस्ता छोड़ रहा
राष्ट्र प्रेम के पुण्य पंथ पर
करते हम आह्वान

तरु पल्लव में छाई लाली
कोयल बोले डाली-डाली
तरुणाई ने ली अंगड़ाई
तन-मन-धन बलिदान

नव युग के नव ज्योत जला
तूफानों से होड़ लगा
बंधन तोड़ दृगों के जर्जर
दे नव धवल विहान

25/01/1977
चित्र गूगल से साभार

17 comments:

  1. रमाकांत जी ने रचे, मस्त-मस्त पद छंद |
    कोयल कूके भोर में, बहे बयार अति मंद ||

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    1. रमाकांत जी ने रचे, मस्त-मस्त पद छंद |
      कोयल कूके भोर में, है बयार अति मंद ||

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  2. सुन्दर...
    बहुत सुन्दर गीत...

    सादर.

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  3. नव धवल विहान का अति सुन्दर आव्हान .

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  4. बहुत सुंदर गीत... वाह!
    हार्दिक बढ़ाईया।

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  5. बहुत सुंदर,बेहतरीन प्रस्तुति

    MY RESENT POST...काव्यान्जलि... तुम्हारा चेहरा.

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  6. बहुत ही बढिया।

    कल 28/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    ... मधुर- मधुर मेरे दीपक जल ...

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  7. देश प्रेम से भरा सुन्दर मंगल गान... शुभकामनाएं

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  8. नव युग के नव ज्योत जला
    तूफानों से होड़ लगा
    बंधन तोड़ दृगों के जर्जर
    दे नव धवल विहान

    अद्भुत पंक्तियाँ ...बहुत सुंदर

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  9. उत्‍साह का संचार कर देने वाली पंक्तियां, बहुत खूब.

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  10. तेरा पौरुष बोल रहा
    सागर रस्ता छोड़ रहा
    राष्ट्र प्रेम के पुण्य पंथ पर
    करते हम आह्वान ...

    बुत ही ओज़स्वी ... पाश्त्र प्रेम का ज्वार उठाती ... उत्तम रचना ...

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  11. नव युग के नव ज्योत जला
    तूफानों से होड़ लगा
    बंधन तोड़ दृगों के जर्जर
    दे नव धवल विहान
    ..bahut sundar !!!!!

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