गुरुकुल ५

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Thursday, 5 September 2013

विक्रम और वेताल 14



विनम्र आग्रह २ पोस्ट पर आये टिप्पणी कर्ता और सुधि जनों की कृपा से
परिवार में आई खुशहाली के लिये मेरा प्रणाम स्वीकारें आपका योगदान
यूँ ही समय पर मिलता रहेगा
आभार सहित आपका रमाकांत

वेताल ने कहा
राजन
आज आपके चेहरे पर गंभीरता की जगह हंसी
कहीं ऐसा तो नहीं
शहर के लोगों की तरह
मैं भी दृष्टि भ्रम का शिकार हो गया हूँ?
चलो आपके थकान हरने के लिये
एक सत्य कथा सुनाता हूँ
एक महानगर में
रमेश ने अपने मित्र आशा राम से पूछा
क्या हालचाल हैं मित्रवर?

आशा राम ने कहा
सब ठीक ठाक है

पत्नी आज कल जिम जाती है
जोड़ों में दर्द रहता है न
मैंने मोबाईल और गाड़ी का
माडल बदल दिया है
कार का एवरेज २० कि मी प्रति लीटर है
नौकर हर माह बदल जाते हैं
बेटा को अनुदान देकर
पढ़ने विदेश भेजा है
लड़की ने लव्ह मेरिज कर लिया है
दामाद और बेटी 
अलग अलग शहर में रहते हैं 

कुत्ते के कारण
घर में कोई नहीं आता
माँ विगत चार साल से 
अपने दामाद के घर है 
बाबूजी वेंटीलेटर पर हैं 
कोई चिंता नहीं है 

खाना होटल से ही आ जाता है
कपड़ा धोने की झंझट नहीं
धोबी सुबह शाम लेकर चला जाता है
क्रेडिट कार्ड है ना
ये घर भी किराये का ही है
पुस्तैनी मकान बेच दिया 
घर के मेंटेनेंस का भी पैसा बच जाता है 

रमेश ने कहा आशा राम जी मानना  पड़ेगा
आपकी व्यवस्था और सहनशीलता की पराकाष्ठा को

चलो आज मेरे घर भोजन करें 

नहीं मित्र डॉ से पूछकर ही बता पाऊंगा 

पिछले माह हार्ट सर्ज़री हुई है न
शुगर बढ़ गया था
सर्ज़री के बाद
नमक, तेल, मिर्च, मसाले पर रोक है न
डॉ ने उबला हुआ ही खाने को कहा है 
और कह रखा है
भले ही दिन में चार बार ही पीना  
लेकिन हेवार्ड सोडा मिलाकर ही पीना
और समुद्री झींगा
स्वास्थ के लिये ठीक रहेगा
कोई टेंशन नहीं है
इन्कम टेक्स का मामला अदालत में है
दो चार साल में  निपट जायेगा

बड़ा भाई स्वर्गवासी है
बहू ने मुक़दमा कर रखा है

मित्र ने पूछा और कुछ

आशा राम ने कहा 
सब ठीक ठाक है 

वेताल ने कहा 
राजन और 
विक्रम ने भी रौ में कह दिया 
सब ठीक ठाक है

बस क्या था 
वेताल भी लटक गया फ़ौरन 
वहीँ आश्रम के वट वृक्ष की डगाल पर 
विक्रम अवाक देखते रह गये
आश्रम की ऊँची दिवार और गेट को
आश्रम की दीवारों को लांघना …?

०५ सितम्बर २०१३
शिक्षक दिवस के अवसर पर 
मेरे बच्चों को समर्पित 
जिनके कारण मुझे जाना जाता है 
चित्र गूगल से साभार  

16 comments:

  1. आश्रम की ऊँची दिवार और गेट को
    आश्रम की दीवारों को लांघना …? ...वाह !!

    शिक्षक दिवस पर आपको ढेर सारा आदर सम्मान दिलों से मिले, यही कामना है !

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  2. उलझन भरी जीवन की राह.

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  3. हमें बस यह जान लेना चाहिए और भली भॉति समझ लेना चाहिए कि हम अपनी समस्याओं से बहुत बडे हैं, जीवन में समस्याओं का होना जीवन को गति प्रदान करता है। ओजस्वी बनाता है ।

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  4. बहुत बढिया रमाकान्त जी..शिक्षक दिवस पर शुभकामनाऎं

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  5. सब ठीक-ठाक तो नही था कथा में पर वह व्यक्ति अपनी समस्याओं में घिरे हो कर भी संतुष्ट था !

    वेताल बड़ा चतुर है ,हमेशा भागने का उपाय सोचे रहता है.
    शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ.

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  6. " पेट में अन्न नहीं है, तन पर वस्त्र नहीं है पर हँसे बिना तो नहीं जिया जा सकता ।" प्रेमचन्द

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  7. उफ़ ! कितना कड़वा यथार्थ !

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  8. बाकी सब ठीक ठाक है :):) सबकी ऐसे ही ठीक ठाक ज़िंदगी चलती रहती है ।

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  9. बहुत ही शानदार और सराहनीय प्रस्तुति....
    बधाई

    इंडिया दर्पण
    पर भी पधारेँ।

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  10. असल सामान के हकदार तो शिक्षक ही होते हैं ... जो शिष्य को सही दिशा देते हैं ओर उनमें सामर्पण का भाव पैदा करते हैं ... आशा राम के जीवन यापन का तरीका भी मस्त है ...

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  11. सुंदर सराहनीय प्रेरक सृजन ! बेहतरीन रचना !!

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  12. अच्छी रचना,
    चिट्ठी को तार समझना.बाकी सब ठीक है

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  13. अच्छी रचना,
    चिट्ठी को तार समझना.बाकी सब ठीक है

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