गुरुकुल ५

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Wednesday, 20 March 2013

यकीन २



मैं यकीन करती हूँ

ईश्वर पर
और उसके बनाये
दो कृतियों पर
नर और मादा

मादा और नर
परमात्मा ने बनाये
हमने अपनी खातिर गढ़े हैं
रिश्ते

रिश्ते
भगवान ने बनाये हैं?
हमने स्वीकार किये?
कुछ मन से
कुछ अनमने?

माँ ने कहा पिता है

हमने स्वीकार लिया भाई बहन
समाज ने लगवा दिए फेरे
बंध गये जन्म जन्मान्तर के बंधन में
मान लिया स्वामी जन्म जन्मों का?

मैंने बतलाया तो
तुम
मेरे पुत्र के पिता
मेरी बेटी के जन्मदाता
बायोलोजिकल
अन्यथा

क्या तो तुम?
क्या तुम्हारी हैसियत?

एक कथन से
बिखर जाते हैं रिश्ते?
टूट जाता है भ्रम
जननी जनक का?

मैं रिश्तों को जीती हूँ
मैं रिश्तों में जीती हूँ

तुम रिसतों को जीते हो
तुम रिसतों में जीते हो

चित्र गूगल से साभार

मौलिकता बनाम परिवर्तन की अंतिम कड़ी
समर्पित मेरी * ज़िन्दगी * को
ज़िन्दगी की जुबानी ज़िन्दगी की कहानी
अल्फाज़ उसके लेखनी मेरी

17 comments:

  1. सुन्दर शब्द प्रवाह और भाव..

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  2. पुरुष को उसकी 'औकात' और 'हैसियत' बडे दम-खम से जताई -

    मैंने बतलाया तो
    तुम
    मेरे पुत्र के पिता
    मेरी बेटी के जन्मदाता
    बायोलोजिकल
    अन्यथा

    क्या तो तुम?
    क्या तुम्हारी हैसियत?

    शानदार। हवा में लहराता कोडा सटाक् से पडा। झन्‍नाटेदार। तबीयत खुश हो गई। नारी का यह स्‍वर पूरे देश में, पूरी दुनिया में गूँज, सम्‍पूर्ण आत्‍म विश्‍वास से गूँजे।

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  3. सुन्दर भाव, बढ़िया शब्द प्रवाह..आभार

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  4. आपसी विश्वास और प्रेम ही रिश्तों का आधार है... बहुत सुन्दर रचना... होली की अग्रिम शुभकामनायें.

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  5. प्‍याज के छिलके से रिश्‍ते.

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  6. विश्वास और प्रेम ही रिश्तों का आधार होता है,बहुत ही सार्थक प्रस्तुति.

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  7. संसार के सभी रिश्ते मानने से ही हैं ... जीने से ही हैं ..
    अन्यथा व्यर्थ की बातें ... हां नारी चाहे तो रिश्ते बने रहते हैं ...

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  8. रिश्‍तों की कडि़या ... जुड़ती जाती हैं शब्‍द दर शब्‍द
    बेहद अनुपम भाव
    सादर

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  9. रिश्तों का आधार हमारे आपके मानने से होता है,वर्ना रिश्तों को तोड़ने में देर कितनी लगती है,,,,

    Recent Post: सर्वोत्तम कृषक पुरस्कार,

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  10. नारी महान है ..
    बधाई बहिया अभिव्यक्ति के लिए !

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  11. sachmuch reste asse hi hote hai nibhao to sab kuch nahi to kuch bhi nahi.sundar rachna.

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  12. सार्थक पंक्तियाँ..... बेहतरीन रचना

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  13. रिश्तों और रिसना ....रिश्तों का रिसना..कौन किस को जीता है.इन शब्दों का अलग परिस्थितयाँ अलग अर्थ रखती हैं.
    अच्छी कविता.

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  14. तथागत ब्लॉग के सृजन करता श्री राजेशकुमार सिंह जी की टिप्पणी
    क्षमा याचना सहित
    बाबूसाहब
    आपके नए पोस्ट पर तीसरा कमेन्ट मैंने किया था मुझे तब तो दिख रहा था अब गायब है दो बार से ऐसा हो जा रहा स्पैम में तो नहीं चला जा रहा,कमेन्ट था

    मातृत्व सच्चाई,पितृत्व विश्वास।सारगर्भित और विचारणीय रचना

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  15. इसमें कोई शक नहीं, हर रिश्ता विश्वास की डोर से ही बंधा होता है।

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