गुरुकुल ५

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Wednesday, 15 May 2013

भरोसा

I LOVE YOU SO MUCH 


*
एस. एम. एस. किया
आई लव यू सो मच
फिर रिंग किया
बड़ी बेचैनी से

प्रिये
तुम्हे एस. एम. एस. मिला?

ये पूछना प्रेमिका से ही
भरोसा उठ गया?

**
संविधान के नियमानुसार
चुना जिसे हमदर्द मानकर
सुख दुःख को बांटने
प्रजा तंत्र की राह पर

फिर ये कहना

सरकार चलेगी?
क्या खुद पर से उठ गया विश्वास?

***
चौराहे पर लगाकर सिगनल
लाल, पीला और हरा
कर दी सिपाही की नियुक्ति
मुसाफिर
रुकेगा या पार हो जायेगा?

तंत्र या नियम पर
रह गया विश्वास?

****
तुम्हे यकीं है
परमात्मा पर?

लेकिन

तुम जानती हो
मुझे तुम पर खुद से ज्यादा

कल उगेगा सूरज पूरब से ही
और डूब जायेगा पश्चिम में

भरोसा रख खुदा पर खुद से ज्यादा
न इम्तहान ले नेकी बदी की कभी

ये जमीं आसमां मिलेंगे क्षितिज पर ही
कभी फलक पे कभी लहरों में समंदर के

१० अप्रेल २०१३
ज़िन्दगी के संग चलते चलते

चित्र गूगल से साभार

20 comments:

  1. भरोसा रख खुदा पर खुद से ज्यादा
    न इम्तहान ले नेकी बदी की कभी

    सही कहा है..सुंदर भाव !

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  2. भरोसा और विश्वास से ही जिन्दगी आगे बढ्ती है....बहुत सुन्दर

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  3. भरोसा ही है जो हर परिस्थिति में पार लगाता है .... सुंदर अभिव्यक्ति

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  4. वाह, सूक्ष्‍म से व्‍यापक सभी आयाम समाहित.

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    1. सर जी आपके मार्गदर्शक टिपण्णी से लेखन को दिशा मिलती है वरदहस्त बनाये रखियेगा

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  5. भरोसा रख खुदा पर खुद से ज्यादा
    न इम्तहान ले नेकी बदी की कभी- विश्वास की पहली सीडी
    latest post हे ! भारत के मातायों
    latest postअनुभूति : क्षणिकाएं

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  6. भरोसा रख खुदा पर खुद से ज्यादा---
    बहुत बढ़िया कहा है।

    अति सुन्दर --- आँखें हैं।

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    1. आपकी पारखी नज़रों को प्रणाम , स्नेह की बारिस वैशाख में भी भिगो गया तन मन

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  7. गहरी अभिव्यक्ति..... सुंदर रेखांकन किया आपने

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  8. भरोसा रख खुदा पर खुद से ज्यादा
    न इम्तहान ले नेकी बदी की कभी

    ...यही भरोसा क़ायम रहे... बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  9. विश्वास,अविश्वास और विश्वासघात की परिभाषाएं बदल जाती हैं समय और स्वार्थ के साथ,मोबाईल युग का यह भी है उपहार

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  10. जिसको सब कुछ कह दिया फिर उसके भरोसे पे भरोसा रख दिया ...
    क्या बात है ... बहुत खूब ..

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  11. निराला अंदाज..

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  12. जीवन को एक परिधि में समेट कर प्रश्न चिन्ह लागते चले गए आप अपनी कविताओं में..गहरी सोच है.

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    1. अल्पना जी आजकल ब्लॉग पर बिना पढ़े टिपण्णी लिखने के दौर में आपकी टिपण्णी दिल को सुकून देती है वरना जिस भाव को उकेरने में महीने लगते हैं और मात्रा, वर्तनी की ढेरों गलती बनी रहती है, किसी को कुछ कहना उचित नहीं लेकिन सोचता हूँ ऐसा क्यों ?

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  13. वाह .... बहुत ही अनुपम भावों का संगम
    सादर

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  14. आदमी को अपने अविश्‍वास पर कितना विश्‍वास है - यही बता दिया आपने बडी सुन्‍दरता से। वाह।

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