गुरुकुल ५

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Wednesday, 11 July 2012

नया द्वार


आँगन के पार
एक बंद द्वार
उम्र के पड़ाव पर
हर साल

एक दीवार इस पार
एक दीवार उस पार

डरता हूँ
हर बार

खोलते नया द्वार

कहीं ऐसा न हो कि
इस द्वार के पार हो
एक अलसाई सी
सरकती नदी

और




पुराने बरगद से बंधी
वही नाव
जिसका खेवनहार
मैं
और सवार भी

वही नाव
वही पतवार
बार&बार

न भरपाई की चिंता
न उतराई का भार

फिर क्यों?
डर जाता हूँ
हर बार
खोलते नया द्वार
video

06.07.2012
एक बार पुन तथागत ब्लॉग के सृजन कर्ता
श्री राजेश कुमार सिंह को उनके ही भाव उनके
ही शब्दों में लिखकर समर्पित, माध्यम बनकर
चित्र गूगल से साभार

18 comments:

  1. फिर क्यों ?
    डर जाता हूँ
    हर बार
    खोलते नया द्वार

    गहरे भाव......

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  2. फिर क्यों ?
    डर जाता हूँ
    हर बार
    खोलते नया द्वार
    बहुत सुंदर भाव ....मन रुके नहीं,मन थके नहीं ...चलना ही ज़िंदगी है ...
    शुभकामनायें.

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  3. डगमग डोले जीवन नैया.

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  4. नैया भी वही...खेवनहार भी वही.....
    वाह..
    बहुत सुन्दर रचना

    अनु

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  5. फिर क्यों?
    डर जाता हूँ
    हर बार
    खोलते नया द्वार...गहन भाव लिए सुन्दर अभिव्यक्ति..

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  6. फिर क्यों?
    डर जाता हूँ
    हर बार
    खोलते नया द्वार
    गहन भाव के साथ उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति।

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  7. भविष्य कैसा होगा क्या लाएगा अपनी झोली में भरकर..यही सोच कर तो मन संशकित रहता है..सुंदर प्रस्तुति !

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  8. खोलो अपने मन के द्वार
    डरना क्यों है बार बार

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  9. के मनवा जाना है उस पार
    के मनवा खोल रे मन द्वार
    छोड़ मोह कांकर पाथर का,झटपट हो ले सवार।

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  10. गहन भाव लिए सुंदर सी कविता !!
    बधाई !!

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  11. न भरपाई की चिंता
    न उतराई का भार
    फिर कैसा डर
    खोलते जाइये
    नित नया द्वार...
    गहन भाव... शुभकामनायें...

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  12. नए द्वार नयी रहें,नयी दुनिया..अनजाने रास्तों से तो हमेशा ही डर लगता है .
    अकेलापन तो वैसे भी भयावह है..कई मनोभावों को कम शब्दों में बखूबी अभिव्यक्त किया है.अतिसुन्दर!

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  13. हर नया द्वार...नई चुनौतियों ...नयी परिस्तिथियों से रूबरू कराता है और शै: शनै: उस सच की ओर ले जाता है जिसे कोई स्वीकारना नहीं चाहता....और यही भय का मुख्य कारण है ......बहुत ही सार्थक अभिव्यक्ति

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  14. इस द्वार के पार हो
    एक अलसाई सी
    सरकती नदी
    और
    पुराने बरगद से बंधी
    वही नाव
    जिसका खेवनहार
    मैं
    और सवार भी.....
    वाह..
    बहुत सुन्दर रचना....
    सादर.

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  15. बेहद प्रभावशाली कविता।

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  16. अज्ञात का डर ऐसा ही होता है..एक बार द्वार खुल जाए तो डर भी मिट जाता है..

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